ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम नहीं हो रहा है. ईरान का साफ कहना है कि अगर अमेरिका की ओर से कोई सैन्य कार्रवाई होती है, तो उसे सीधे जंग माना जाएगा. इस बीच चीन की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. कई लोगों को लगता है कि चीन ईरान का साथ देगा, लेकिन जानकारों की राय इससे अलग है. संकेत मिल रहे हैं कि चीन इस मामले में खुलकर ईरान के सपोर्ट में नहीं आएगा.
विशेषज्ञों के अनुसार, चीन की विदेश नीति का एक अहम हिस्सा है दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में दखल न देना. चीन आमतौर पर सैन्य हस्तक्षेप से बचता है और बातचीत के रास्ते को प्राथमिकता देता है. ईरान के मामले में भी चीन यही रुख अपनाए हुए है. वो स्थिति पर नजर रखेगा, लेकिन खुद को किसी टकराव में फंसाने से बचेगा.
अगर ईरान में सत्ता परिवर्तन होता है या वहां गृहयुद्ध जैसी स्थिति बनती है, तो इसका असर सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं रहेगा. बड़ी संख्या में लोग देश छोड़ने को मजबूर हो सकते हैं. इससे आसपास के देशों पर दबाव बढ़ेगा और पूरे पश्चिम एशिया में अस्थिरता फैल सकती है. ये स्थिति चीन के व्यापार और निवेश के लिए नुकसानदायक हो सकती है. ऐसे संकट से निपटना चीन के लिए लंबे समय तक मुश्किलें खड़ी कर सकता है.
विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन अच्छी तरह समझता है कि ईरान का खुला सपोर्ट करने का मतलब अमेरिका या इजराइल से सीधी टक्कर लेना हो सकता है. चीन इस तरह के टकराव से बचना चाहता है. इसलिए वो शांत और कम बोलने वाली नीति अपनाए हुए है. चीन का जोर इस बात पर है कि समस्या का हल बातचीत से निकले, न कि हथियारों से.
चीन और ईरान के बीच कोई ऐसा सैन्य समझौता नहीं है, जो चीन को ईरान का साथ देने के लिए बाध्य करे. दोनों देशों के रिश्ते साझेदारी तक सीमित हैं. इसके अलावा चीन ये भी देख रहा है कि ईरान रूस के करीब है और रूस की स्थिति पहले जैसी मजबूत नहीं रही. ऐसे में चीन किसी ऐसे संघर्ष में खुद को नहीं झोंकना चाहता, जिसमें उसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़े.
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