ईरान इस समय अपने इतिहास में सबसे गंभीर आतरिक संकट से गूजर रहा है। देश में कई महिनों से सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन ने अब भयावह रूप ले लिया है। पहली बार ईरानी सत्ता तंत्र से जुड़े एक वरिष्ट अधिकारी ने स्वीकार किया है कि विरोध प्रदर्शनों और उससे जुड़ी हिंसा के तकरीबन 2 हजार से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। यह कबूलनामा ऐसे समय पर आया है जब सरकार अब तक मौतों के आंकड़ो को नकारती रही थी या उन्हें बेहत कम बताती थी।
ईरान में बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, ईंधन संकट और नागरिक स्वतंत्रताओं पर सख्ती ने आम जनता के सब्र का बांध तोड़ दिया। युवा, महिलाएं और मजदूर वर्ग सड़कों पर उतर आए। शुरुआत शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से हुई, लेकिन सुरक्षा बलों की सख्ती, गिरफ्तारियों और इंटरनेट बंदी ने हालात को विस्फोटक बना दिया।
सरकारी बयान के मुताबिक, मारे गए लोगों में प्रदर्शनकारी, आम नागरिक और सुरक्षा बलों के जवान शामिल हैं। हालांकि मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है, क्योंकि कई इलाकों से अब भी सूचनाएं सामने नहीं आ पा रही हैं। इंटरनेट और मीडिया पर कड़े प्रतिबंधों के चलते सच्चाई तक पहुंचना बेहद मुश्किल बना हुआ है।
ईरान की इस स्वीकारोक्ति के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय में हलचल तेज हो गई है। कई देशों और मानवाधिकार संगठनों ने स्वतंत्र जांच की मांग की है। संयुक्त राष्ट्र और पश्चिमी देशों ने हिंसा पर गहरी चिंता जताते हुए ईरानी सरकार से संयम बरतने और नागरिक अधिकारों का सम्मान करने की अपील की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि जनता और सत्ता के बीच गहरे भरोसे के टूटने का संकेत है। अगर सरकार संवाद और सुधार की राह नहीं अपनाती, तो हालात और बिगड़ सकते हैं। ईरान आज सिर्फ जल नहीं रहा, बल्कि बदलने की कगार पर खड़ा है और यह बदलाव किस दिशा में जाएगा, इस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं।
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