खालिस्तान समर्थक संगठन सिख्स फॉर जस्टिस (SFJ) एक बार फिर अपने विवादित एजेंडे को लेकर सुर्खियों में है। प्रस्तावित “खालिस्तान पीस मार्च” से ठीक पहले SFJ ने एक ऐसा दावा किया है, जिसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति और सुरक्षा एजेंसियों का ध्यान खींच दिया है।
संगठन का कहना है कि उसने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अपने तथाकथित “बोर्ड ऑफ पीस” का सदस्य बनाने के लिए 1 अरब डॉलर (करीब 8,300 करोड़ रुपये) की पेशकश की है। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और न ही ट्रंप या उनके कार्यालय की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आई है।
SFJ के मुताबिक, यह पेशकश “शांति और मानवाधिकारों के समर्थन” के नाम पर की गई है। संगठन का कहना है कि वह वैश्विक स्तर पर खालिस्तान के मुद्दे को राजनीतिक और कूटनीतिक समर्थन दिलाने के लिए बड़े अंतरराष्ट्रीय चेहरों को अपने मंच से जोड़ना चाहता है। इसी रणनीति के तहत ट्रंप को “बोर्ड ऑफ पीस” में शामिल होने का न्योता दिया गया है। SFJ यह भी दावा कर रहा है कि इस बोर्ड का मकसद विभिन्न देशों में “शांति पहल” को आगे बढ़ाना है।
SFJ की यह कथित पेशकश ऐसे समय पर सामने आई है, जब संगठन अमेरिका और अन्य देशों में “खालिस्तान पीस मार्च” आयोजित करने की तैयारी में है। भारत सरकार पहले ही SFJ को प्रतिबंधित संगठन घोषित कर चुकी है और उस पर भारत की संप्रभुता और अखंडता के खिलाफ गतिविधियों में शामिल होने के आरोप लगते रहे हैं। भारतीय सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि ऐसे मार्च और अंतरराष्ट्रीय प्रचार अभियानों के जरिए SFJ अलगाववादी विचारधारा को हवा देना चाहता है।
भारत सरकार और सुरक्षा एजेंसियां SFJ की गतिविधियों पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। इससे पहले भी SFJ पर विदेशों में भारत विरोधी जनमत तैयार करने, रेफरेंडम जैसे आयोजनों के जरिए अलगाववाद को बढ़ावा देने और सोशल मीडिया के माध्यम से युवाओं को भड़काने के आरोप लगते रहे हैं। ट्रंप को लेकर किया गया ताजा दावा भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, ताकि संगठन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैधता और सुर्खियां मिल सकें।
डोनाल्ड ट्रंप या उनके किसी करीबी सहयोगी की ओर से अब तक SFJ के दावे पर कोई बयान नहीं आया है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप जैसे बड़े नेता का नाम जोड़कर SFJ अपने अभियान को विश्वसनीय दिखाने की कोशिश कर रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, जब तक ट्रंप की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं होती, तब तक इसे SFJ का एकतरफा प्रचार कदम माना जाना चाहिए।
इस पूरे घटनाक्रम ने सुरक्षा एजेंसियों के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। अगर कोई संगठन खुलेआम इतनी बड़ी रकम की पेशकश का दावा कर रहा है, तो उसके फंडिंग सोर्स, मकसद और नेटवर्क की गहन जांच जरूरी हो जाती है। भारत पहले ही अमेरिका और अन्य सहयोगी देशों के साथ मिलकर खालिस्तान समर्थक नेटवर्क पर कार्रवाई की मांग करता रहा है।
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