राजनीतिक और पुलिस सूत्रों के अनुसार, लक्की ओबरॉय का प्रभाव धीरे-धीरे अपने पारंपरिक दायरे से बाहर निकल चुका था. पहले जहां उनकी पकड़ मोहल्ले या वार्ड तक सीमित मानी जाती थी, वहीं अब कॉलेज परिसरों की प्रधानगी और उससे जुड़े अहम फैसलों में उनका दखल लगातार बढ़ रहा था. यही बढ़ता असर कुछ स्थापित गुटों को असहज करने लगा और समय के साथ यह असहमति खुली दुश्मनी में बदलती चली गई.
कॉलेज सियासत में लक्की ओबरॉय की पहचान एक उभरते हुए प्रभावशाली चेहरे के रूप में होने लगी थी. छात्र जीवन के दौरान ही वे सक्रिय रूप से स्टूडेंट्स राजनीति से जुड़े रहे और यहीं से उन्होंने नेतृत्व, नेटवर्क और रणनीति की बारीकियां सीखीं. जानकारों का मानना है कि यही शुरुआती अनुभव आगे चलकर उनकी राजनीतिक यात्रा की मजबूत नींव बना.
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, कॉलेजों की प्रधानगी को केवल छात्र राजनीति तक सीमित नहीं देखा जा सकता. यह स्थानीय सियासत का एक अहम पावर सेंटर होती है. छात्र यूनियन, एजुकेशनल ट्रस्ट, फंड, ठेके और नियुक्तियों तक पहुंच रखने वाले लोग आगे चलकर नगर राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाते हैं. लक्की ओबरॉय का राजनीतिक ग्राफ भी इसी रास्ते से ऊपर चढ़ता बताया जा रहा है. आम आदमी पार्टी में उनकी गिनती दूसरी कतार के प्रभावशाली नेताओं में होने लगी थी.
शुरुआत में टकराव खुलकर सामने नहीं आया. विरोध और असहमति सोशल मीडिया पोस्ट, परोक्ष चेतावनियों और दबाव तक ही सीमित रही. 25 दिसंबर को सामने आई एक चेतावनी भरी पोस्ट को भी इसी कॉलेज सियासत के संदर्भ में देखा जा रहा है. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि जब स्थानीय सत्ता, कॉलेज नेटवर्क और पार्टी की हिमायत एक साथ जुड़ती है, तो हालात बेहद संवेदनशील और विस्फोटक हो जाते हैं. लक्की ओबरॉय धीरे-धीरे इसी संगम का प्रतीक बनते जा रहे थे.
27 जनवरी को लक्की ओबरॉय का जन्मदिन पूरे उत्साह के साथ मनाया गया. मॉडल टाउन के दुकानदारों, युवाओं और समर्थकों ने केक काटे, लंबी उम्र की कामनाएं कीं. फेसबुक लाइव पर हंसी-ठहाके, नारे और तोहफों का दौर चलता रहा. किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि महज 11 दिन बाद यही खुशी गहरे मातम में बदल जाएगी.
लक्की ओबरॉय की आखिरी सोशल मीडिया पोस्ट उनकी सक्रिय राजनीतिक भूमिका को साफ दिखाती है. छह फरवरी की सुबह उन्होंने खुरालगढ़ के लिए बसें रवाना करने की जानकारी साझा की थी. गुरुद्वारा साहिब में माथा टेकने के बाद वे इसी कार्यक्रम की तैयारियों में जुटे थे, लेकिन बसें चलने से पहले ही गोलियों ने उनके कदम रोक दिए.
फाइनेंस और रियल एस्टेट से जुड़े लक्की ओबरॉय 2022 के बाद आम आदमी पार्टी में तेजी से उभरे. हलका कैंट से आप इंचार्ज राजविंदर कौर थियाड़ा के करीबी माने जाने लगे. नगर निगम चुनाव में पत्नी को मैदान में उतारना भी उनके बढ़ते राजनीतिक आत्मविश्वास का संकेत माना गया. घटना के बाद श्रीराम अस्पताल में मां का बार-बार बेटे की हालत पूछना और पत्नी का प्रार्थना में डूबा रहना हर आंख को नम कर गया.
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