पंजाब की राजनीति में इस समय लुधियाना वेस्ट विधानसभा सीट का उपचुनाव एक बड़े प्रतिष्ठा की लड़ाई बन चुका है. 19 जून को होने वाला यह उपचुनाव आम आदमी पार्टी (AAP) के लिए “करो या मरो” की स्थिति जैसा है, खासकर तब जब दिल्ली में हार के बाद पार्टी को पंजाब में अपनी पकड़ मजबूत करने की सख्त जरूरत है. सीट AAP के विधायक गुरप्रीत बसी गोगी की मृत्यु के बाद खाली हुई थी. 11 जनवरी को उनके आवास पर उनकी लाइसेंसी बंदूक गलती से चल गई और उनकी मौत हो गई थी.
अब इस सीट पर जीत हासिल करने के लिए आम आदमी पार्टी ने अपने राज्यसभा सांसद और लुधियाना के नामी उद्योगपति संजीव अरोड़ा को मैदान में उतारा है. दिलचस्प बात ये है कि अरोड़ा अब तक के सबसे अमीर उम्मीदवारों में शामिल हैं. दूसरी ओर कांग्रेस ने अपने वरिष्ठ नेता और पूर्व विधायक भरत भूषण आशु को टिकट दिया है, जो 2022 में दूसरे स्थान पर रहे थे। शिरोमणि अकाली दल (SAD) ने परुपकार सिंह घुम्मन को मैदान में उतारा है, जबकि बीजेपी ने जीवन गुप्ता को उम्मीदवार बनाया है.
हालांकि भरत भूषण आशु की स्थानीय पकड़ मजबूत मानी जा रही है, लेकिन कांग्रेस में आंतरिक कलह उनके वोट बैंक को प्रभावित कर सकती है। वहीं, AAP की सरकार अपनी “सुशासन की छवि” पर वोट मांग रही है, भले ही उन पर कई वर्गों के विरोध प्रदर्शन का सामना करना पड़ रहा हो. दिलचस्प बात यह है कि पार्टी के सभी बड़े नेता, जिनमें अरविंद केजरीवाल तक शामिल हैं, लुधियाना में डेरा डाले हुए हैं. AAP नहीं चाहती कि पंजाब की सत्ता में रहते हुए वह यह सीट विपक्ष को सौंपे.
सियासी पारा तब और चढ़ गया जब पंजाब सरकार ने 6 जून को विजिलेंस ब्यूरो के SSP जगतप्रीत सिंह को निलंबित कर दिया. सिंह ने भरत भूषण आशु को एक पुराने स्कूल ज़मीन घोटाले में समन भेजा था, जिससे माना गया कि सरकार ने उन्हें सस्पेंड करके विपक्ष को हमलावर होने से रोका. गौरतलब है कि जब AAP सत्ता में आई थी, तब आशु को कथित अनाज घोटाले में गिरफ्तार किया गया था और उन्होंने लगभग दो साल जेल में बिताए. लेकिन हाल ही में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को “राजनीतिक बदलेबाजी” बताते हुए रद्द कर दिया. वोटों की गिनती 23 जून को होगी और तब तय होगा कि AAP अपनी साख बचा पाती है या विपक्ष इस मौके को भुना लेता है.
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