दिल्ली हाईकोर्ट ने शादीशुदा जीवन में यौन संबंधों को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है. कोर्ट ने कहा कि अगर किसी पत्नी ने साफ तौर पर यह नहीं कहा कि उसने ओरल या एनल सेक्स के लिए मना किया था, तो पति पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 377 के तहत मामला नहीं चलाया जा सकता.
यह केस एक महिला की शिकायत से जुड़ा था, जिसमें उसने आरोप लगाया कि शादी के बाद उसका पति यौन रूप से असक्षम है और हनीमून के दौरान उसने ओरल सेक्स किया. महिला ने अपनी शिकायत में सेक्शन 354, 354B, 376, 377 और 323 IPC के तहत आरोप लगाए थे. हालांकि, निचली अदालत ने बाकी आरोपियों को बरी कर दिया लेकिन पति पर सेक्शन 377 के तहत ट्रायल चलाने का आदेश दिया. सेशंस कोर्ट ने कहा था कि पति ने पत्नी की इच्छा के खिलाफ ओरल सेक्स किया, इसलिए उस पर धारा 377 लगती है.
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ ने इस आदेश को खारिज करते हुए कहा कि पत्नी ने अपनी शिकायत में कहीं भी यह नहीं कहा कि यह संबंध उसकी मर्जी के खिलाफ या किसी दबाव में बनाए गए थे. कोर्ट ने माना कि शादी के भीतर हुए यौन संबंधों को रेप नहीं माना जा सकता, जब तक कि पत्नी 15 साल से ऊपर हो और वह खुद न कहे कि वह संबंध उसकी इच्छा के खिलाफ थे. कोर्ट ने 2013 के आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम और सुप्रीम कोर्ट के Navtej Singh Johar केस का हवाला देते हुए कहा कि धारा 377 अब केवल ऐसे मामलों पर लागू होती है जहाँ सहमति न हो या पार्टनर नाबालिग हो.
पति-पत्नी के बीच ओरल या एनल सेक्स अगर पत्नी की मर्जी के बिना नहीं हुआ हो, तो यह धारा 377 के दायरे में नहीं आता. पत्नी के बयान में कहीं यह नहीं लिखा था कि वह सेक्स बिना सहमति के हुआ. ऐसे में सेशंस कोर्ट द्वारा लगाया गया चार्ज "गलत पढ़ा गया" और कानूनन सही नहीं था. दिल्ली हाईकोर्ट ने सेशंस कोर्ट के 16 फरवरी 2024 के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें पति पर धारा 377 के तहत चार्ज फ्रेम करने का आदेश दिया गया था. कोर्ट ने कहा कि शादी के भीतर किसी भी यौन क्रिया को आपराधिक ठहराने के लिए पत्नी की स्पष्ट असहमति ज़रूरी है.
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