कोविड-19 महामारी के बाद से वर्चुअल मीटिंग्स ने निजी और पेशेवर जीवन की सीमाओं को धुंधला कर दिया है। अब लोगों का अपने बेडरूम से वीडियो कॉल में शामिल होना या बैठक के दौरान मल्टीटास्किंग करना आम हो गया है। लेकिन जब बात अदालत जैसी गरिमामयी संस्थाओं की हो, तो ऐसी ढील अस्वीकार्य मानी जाती है.
हाल ही में गुजरात हाईकोर्ट की एक वर्चुअल सुनवाई के दौरान ऐसा ही एक शर्मनाक और असभ्य दृश्य सामने आया, जिसने सोशल मीडिया पर तहलका मचा दिया। एक व्यक्ति वीडियो कॉल के ज़रिए अदालत की कार्यवाही में शौचालय में बैठे हुए शामिल हुआ, और कैमरे पर जो कुछ रिकॉर्ड हुआ, उसने न्याय प्रणाली की गरिमा को कठघरे में खड़ा कर दिया.
"समद बैटरी" नाम से लॉगइन, कैमरे पर साफ दिखा था शौचालय का दृश्य वायरल वीडियो में दिखाया गया है कि शख्स ने “Samad Battery” नाम से अदालत की कार्यवाही में हिस्सा लिया। उसके गले में ब्लूटूथ ईयरफोन था और उसने अपने मोबाइल फोन को थोड़ी दूरी पर रखा था। शुरुआत में स्थिति सामान्य लगी, लेकिन कुछ ही देर में कैमरे का एंगल बदला और साफ दिखा कि वह व्यक्ति शौचालय में बैठा है।
A video showing a man attending Gujarat High Court virtual proceedings while seated on a toilet and apparently relieving himself has gone viral on the social media.
— Bar and Bench (@barandbench) June 27, 2025
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वीडियो में वह खुद को साफ करते हुए भी नजर आता है, जिसके बाद वह कुछ देर के लिए कैमरे से गायब हो जाता है और फिर किसी दूसरे कमरे में वापस दिखाई देता है।
FIR रद्द करने की याचिका में था पक्षकार, खुद ही था मूल शिकायतकर्ता Bar & Bench की रिपोर्ट के मुताबिक, यह व्यक्ति उस याचिका में एक पक्षकार था, जिसमें FIR को रद्द करने की मांग की गई थी। वह खुद इस मामले का मूल शिकायतकर्ता भी था। सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने अदालत को सूचित किया कि मामला आपसी समझौते से सुलझ गया है, जिसके बाद कोर्ट ने FIR को रद्द कर दिया।
यह पहली शर्मनाक घटना नहीं, पहले भी लग चुका है 50 हजार का जुर्माना गुजरात हाईकोर्ट इससे पहले भी ऐसी ही एक घटना का सामना कर चुका है। अप्रैल महीने में एक वर्चुअल सुनवाई के दौरान एक याचिकाकर्ता को सिगरेट पीते हुए देखा गया था, जिस पर अदालत ने 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया था।
कोर्ट की गरिमा बनाम डिजिटल लापरवाही इन घटनाओं के सामने आने के बाद वर्चुअल अदालतों में शिष्टाचार और आचार संहिता को लेकर सख्त दिशा-निर्देशों की मांग जोर पकड़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी वही अनुशासन और मर्यादा होनी चाहिए, जो भौतिक अदालतों में अपेक्षित होती है।
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