पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने मंगलवार को पुलिस अधिकारियों की तीन साल की तैनाती नीति पर सवाल उठाते हुए पूछा कि यह नियम केवल निचले रैंक के अधिकारियों तक क्यों सीमित है. न्यायालय ने पंजाब सरकार से कहा कि वे इस नीति को इंस्पेक्टर और उससे ऊपर के अधिकारियों पर भी लागू करने पर विचार करें.
हाईकोर्ट की डिविजन बेंच, जिसमें न्यायमूर्ति अनुपिंदर सिंह ग्रेवाल और न्यायमूर्ति दीपक मंचंडा शामिल हैं, ने पंजाब में संगठित अपराध और कानून व्यवस्था पर कोर्ट-संवर्धित सार्वजनिक हित याचिका (PIL) की सुनवाई की.
इस दौरान डीजीपी गौरव यादव ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जानकारी दी कि सुरक्षा प्रोटेक्टियों की समीक्षा शुरू की गई है ताकि पैट्रोलिंग और कानून व्यवस्था के लिए पर्याप्त स्टाफ उपलब्ध कराया जा सके. इसके साथ ही राज्य में मैनपावर ऑडिट भी चल रहा है.
कोर्ट ने ध्यान दिलाया कि 21 मई 2020 को जारी निर्देशों के अनुसार कॉन्स्टेबल से इंस्पेक्टर तक के पुलिस कर्मियों की एक जिले में अधिकतम तैनाती तीन साल तक ही होती है. न्यायालय ने इसे “अजीब” बताया कि यह नीति केवल निचले रैंक तक ही लागू है. बेंच ने कहा कि वरिष्ठ अधिकारियों के लिए भी इसी तरह का दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए.
कोर्ट ने डीजीपी को आदेश दिया कि वे हलफनामा दाखिल करें, जिसमें बताया जाए कि क्या इंस्पेक्टर और उससे ऊपर के रैंक के अधिकारी, जो किसी जिले में लगातार तीन साल से तैनात हैं, उन्हें नीति के अनुसार स्थानांतरित किया जाएगा.
डीजीपी ने कोर्ट को जानकारी दी कि मोहाली कोर्ट परिसर में हुई घटना की चार्जशीट 7 फरवरी 2026 को दाखिल की गई थी. उन्होंने कोर्ट से चार्जशीट की प्रति रिकॉर्ड में रखने और एफआईआर दर्ज होने से लेकर चार्जशीट दाखिल होने तक की जांच की प्रगति दिखाने के लिए केस डायरी प्रस्तुत करने का समय मांगा.
साथ ही कोर्ट को बताया गया कि सीनियर एसएसपी मोहाली, हरमंदिप सिंह हंस पर प्रधानमंत्री के दौरे (20 जनवरी 2022) के दौरान सुरक्षा चूक के संबंध में अनुशासनात्मक कार्यवाही चल रही है. राज्य सरकार ने अदालत से समय मांगा ताकि वे इस अनुशासनात्मक कार्रवाई की स्थिति के बारे में अवगत करा सकें.
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