पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने शिरोमणि अकाली दल के नेता बिक्रम सिंह मजीठिया पर सख्त रुख अपनाया है. अदालत ने एक अहम याचिका की सुनवाई में हिस्सा न लेने पर मजीठिया पर 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है. कोर्ट का कहना है कि न्यायिक प्रक्रिया में लापरवाही को किसी भी हाल में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
यह पूरा मामला पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में चल रही एक याचिका से जुड़ा हुआ है. कोर्ट ने पहले से ही सुनवाई की तारीख तय कर रखी थी, लेकिन तय दिन पर न तो बिक्रम सिंह मजीठिया खुद अदालत पहुंचे और न ही उनकी ओर से कोई वकील पेश हुआ. इस पर कोर्ट ने नाराजगी जाहिर की और इसे गंभीर लापरवाही माना.
हाई कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि जब कोई मामला अदालत में विचाराधीन होता है, तो उसमें शामिल सभी पक्षों की जिम्मेदारी बनती है कि वे सुनवाई में मौजूद रहें. बिना किसी ठोस कारण के गैरहाजिर रहना न सिर्फ अदालत के समय की बर्बादी है, बल्कि न्यायिक व्यवस्था का अपमान भी है. इसी वजह से कोर्ट ने मजीठिया पर जुर्माना लगाने का फैसला किया.
इस मामले में एक खास बात यह रही कि अदालत ने जुर्माने की राशि सरकारी खजाने में जमा कराने के बजाय सीधे याचिकाकर्ता और आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह को देने का आदेश दिया. कोर्ट का मानना है कि याचिकाकर्ता को बार-बार अदालत आना पड़ता है और दूसरे पक्ष की गैरहाजिरी से उसका समय और मेहनत दोनों बेकार जाते हैं. ऐसे में मुआवजे के तौर पर यह रकम दी जानी चाहिए.
हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद पंजाब की राजनीति में हलचल तेज हो गई है. आम आदमी पार्टी ने इसे कानून की जीत और अदालत की सख्ती बताया है. पार्टी नेताओं का कहना है कि अब कोई भी नेता अदालत की प्रक्रिया को हल्के में नहीं ले सकता.
वहीं, शिरोमणि अकाली दल के समर्थकों का कहना है कि मजीठिया आगे की सुनवाई में अदालत के सामने मजबूती से अपना पक्ष रखेंगे. उनका दावा है कि यह सिर्फ एक प्रक्रिया से जुड़ा मामला है, जिसे जरूरत से ज्यादा तूल दिया जा रहा है.
हाई कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया है कि अगली सुनवाई में सभी पक्षों की मौजूदगी अनिवार्य होगी. अगर दोबारा किसी तरह की लापरवाही सामने आई, तो और भी सख्त कार्रवाई की जा सकती है. कोर्ट के इस रुख से यह संदेश साफ है कि न्यायिक प्रक्रिया में ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी.
कुल मिलाकर, हाई कोर्ट का यह फैसला यह दिखाता है कि कानून सबके लिए बराबर है, चाहे वह कितना ही बड़ा नेता क्यों न हो. मजीठिया पर लगाया गया जुर्माना सिर्फ एक आर्थिक दंड नहीं, बल्कि न्यायिक अनुशासन का सख्त संदेश भी है. यह मामला आने वाले दिनों में राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर चर्चा में बना रह सकता है.
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