दिल्ली के प्रसिद्ध अक्षरधाम मंदिर में गुरुवार का दिन बेहद खास रहा। यहां तपोमूर्ति श्रीनीलकंठवर्णी (भगवान स्वामीनारायण) की 108 फीट ऊंची भव्य प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा विधि-विधान और मंत्रोच्चार के साथ संपन्न हुई। यह आयोजन बेहद धार्मिक और आध्यात्मिक माहौल में हुआ, जिसमें देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी कई संत और श्रद्धालु शामिल हुए। इस पवित्र कार्य को BAPS संस्था के प्रमुख महंतस्वामी महाराज ने पूरा किया।
इस खास अवसर पर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों जैसे अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया से 300 से ज्यादा संत और महंत दिल्ली पहुंचे। महंतस्वामी महाराज 19 मार्च को ही दिल्ली आ गए थे, और 21 मार्च को उनका भव्य स्वागत भी किया गया। इस आयोजन ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
यह विशाल प्रतिमा पंचधातु से बनाई गई है और इसे तैयार करने में लगभग एक साल का समय लगा। इसे 8 फीट ऊंचे मंच पर स्थापित किया गया है, जिससे इसकी भव्यता और भी बढ़ जाती है। इस प्रतिमा को बनाने में खास तौर पर कांस्य धातु का उपयोग किया गया है। करीब 50 कारीगरों, संतों और कई स्वयंसेवकों ने मिलकर इसे तैयार किया। यह प्रतिमा भगवान स्वामीनारायण के तप और त्याग को दर्शाती है, जो इसे और भी विशेष बनाती है।
भगवान स्वामीनारायण ने बहुत छोटी उम्र में ही अपना घर छोड़ दिया था। केवल 11 साल की उम्र में उन्होंने पूरे भारत की यात्रा शुरू की, जो करीब 7 साल तक चली। इस दौरान उन्होंने 12 हजार किलोमीटर से अधिक की यात्रा की और कई प्रसिद्ध तीर्थ स्थलों जैसे हिमालय, बद्रीनाथ, केदारनाथ, रामेश्वरम और द्वारका गए। इसी यात्रा के दौरान उन्होंने ‘नीलकंठ वर्णी’ नाम धारण किया और लोगों को धर्म, सेवा और मानवता का संदेश दिया।
इस महोत्सव की शुरुआत एक दिन पहले विश्व शांति महायज्ञ से हुई थी। मंदिर परिसर में वैदिक रीति-रिवाजों के साथ पूजा और अनुष्ठान किए गए। इस अवसर पर महंतस्वामी महाराज ने दुनिया में शांति और एकता के लिए प्रार्थना की। उन्होंने सभी से प्रेम और भाईचारे के साथ रहने का संदेश दिया। कार्यक्रम के अंत में सफेद कबूतर उड़ाकर शांति का प्रतीकात्मक संदेश भी दिया गया।
यह प्रतिमा केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं है, बल्कि यह लोगों को तप, त्याग, करुणा और सेवा जैसे मूल्यों को अपनाने की प्रेरणा देती है। अक्षरधाम में स्थापित यह भव्य प्रतिमा आने वाले समय में लाखों लोगों के लिए आस्था और प्रेरणा का केंद्र बनेगी।
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