भारत में लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन का प्रश्न एक बार फिर चर्चा में है, खासकर जब यह बहस उत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों के बीच जनसंख्या और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के असंतुलन की ओर संकेत करती है। परिसीमन की प्रक्रिया, जो 1951, 1961 और 1971 की जनगणनाओं के आधार पर समय-समय पर होती रही थी, आपातकाल के दौरान लाए गए 42वें संशोधन द्वारा 25 वर्षों के लिए स्थगित कर दी गई। बाद में 2001 में इसे फिर से 2026 तक के लिए बढ़ा दिया गया। अब यह अवधि समाप्त होने को है, और परिसीमन की आवश्यकता दोबारा प्रासंगिक हो गई है।
वर्तमान में हिंदी भाषी राज्यों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है। उदाहरण के तौर पर, जहां दक्षिण भारत के एक लोकसभा क्षेत्र में औसतन 21 लाख मतदाता हैं, वहीं उत्तर भारत के एक क्षेत्र में यह संख्या 31 लाख के करीब है। यह स्थिति 'एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य' जैसे संवैधानिक सिद्धांत के प्रतिकूल है।

दक्षिण भारत के कुछ नेताओं का तर्क है कि उन्होंने परिवार नियोजन नीतियों का पालन कर जनसंख्या को नियंत्रित किया है, जबकि उत्तर भारत के राज्यों में ऐसा नहीं हुआ। वे मानते हैं कि परिसीमन से उनके राज्य राजनीतिक रूप से कमजोर हो जाएंगे। लेकिन ऐतिहासिक आंकड़े बताते हैं कि 1881 से 1971 तक दक्षिण भारत में जनसंख्या वृद्धि की दर उत्तर भारत से कहीं अधिक रही है, और उन्होंने पहले ही इसका लाभ ले लिया।
अब जबकि बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की जनसंख्या में वृद्धि हुई है, उन्हें उचित प्रतिनिधित्व से वंचित रखा गया है। यह लोकतंत्र और संविधान दोनों के साथ अन्याय है। परिसीमन केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार है, जो प्रतिनिधित्व की समानता सुनिश्चित करता है।
बिहार सहित हिंदी पट्टी के राज्यों में यह मांग जोर पकड़ रही है कि परिसीमन की प्रक्रिया को शीघ्र शुरू किया जाए और 50 वर्षों से चल रहे इस असमानता को समाप्त किया जाए। यह केवल राजनीतिक मांग नहीं, बल्कि जनमत और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का आह्वान है। इस मुद्दे को उठाकर संपूर्ण क्रांति के अधूरे कार्यों को पूरा करने की प्रतिबद्धता दोहराई जा रही है।
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