पंजाब में फरवरी 2027 में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव से पहले सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं. राज्य की राजनीति एक बार फिर पंथक एजेंडे के इर्द-गिर्द घूमती नजर आ रही है. शिरोमणि अकाली दल और आम आदमी पार्टी के बाद अब भारतीय जनता पार्टी ने भी पंथक राजनीति को अपनी रणनीति का अहम हिस्सा बनाना शुरू कर दिया है. राजनीतिक दलों का मानना है कि पंजाब में पंथक मुद्दे मतदाताओं की भावनाओं से सीधे जुड़ते हैं और चुनावी नतीजों को गहराई से प्रभावित कर सकते हैं.
जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, सभी राजनीतिक दल पूरी तरह चुनावी मोड में आ चुके हैं. विपक्षी दल आम आदमी पार्टी सरकार को कानून-व्यवस्था, नशा तस्करी, अधूरे वादों और लंबित परियोजनाओं को लेकर घेरने की तैयारी कर रहे हैं. वहीं, आप सरकार बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में किए गए सुधारों के साथ-साथ औद्योगिक और बुनियादी ढांचे के विकास को अपनी प्रमुख उपलब्धियों के रूप में जनता के सामने रख रही है.
इन तमाम मुद्दों के बीच एक ऐसा एजेंडा है, जो सत्ता पक्ष और विपक्ष—दोनों के लिए समान रूप से अहम बन गया है, और वह है पंथक राजनीति. पंजाब की सियासत में पंथक मुद्दों का प्रभाव हमेशा निर्णायक रहा है. यही कारण है कि सभी दल इस एजेंडे को बेहद संतुलन और रणनीतिक तरीके से आगे बढ़ाने में जुटे हुए हैं, क्योंकि इसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह के राजनीतिक परिणाम सामने आ सकते हैं.
पंथक एजेंडे को धार देने के लिए सरकार की ओर से कई अहम घोषणाएं की जा चुकी हैं. हलवारा एयरपोर्ट का नाम श्री गुरु रविदास जी के नाम पर रखने का फैसला हो या फरीदपुर में गुरु रविदास जी की बाणी पर अनुसंधान केंद्र स्थापित करने की घोषणा-इन कदमों को राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है. इसके अलावा, गुरु तेग बहादुर जी के 350वें शहादत दिवस के भव्य आयोजन के बाद पूरे वर्ष श्री गुरु रविदास जी की 649वीं जयंती मनाने का एलान भी किया गया है.
इसी तर्ज पर भाजपा ने भी पंथक गतिविधियों को तेज किया है. पार्टी ने गुरु तेग बहादुर जी का शहादत दिवस हर जिले में मनाया और अब श्री गुरु रविदास जी की जयंती को बड़े स्तर पर आयोजित कर रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का डेरा सचखंड बल्लां दौरा भी इसी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है. वहीं, आम आदमी पार्टी के मंत्री और नेता क्रिसमस आयोजनों में शामिल हुए और अब प्रदेश भर में ‘हमारे राम’ नाटक के 40 शो करवाने की तैयारी की जा रही है.
आने वाले समय में एसजीपीसी चुनाव, बेअदबी के मामले, बहिबलकलां और कोटकपूरा गोलीकांड, श्री अकाल तख्त के जत्थेदारों की नियुक्ति, गुरुद्वारों के प्रबंधन से जुड़े विवाद और सिख संस्थानों पर सरकारी हस्तक्षेप जैसे मुद्दे सियासी बहस का केंद्र बने रहेंगे. साफ है कि 2027 का पंजाब विधानसभा चुनाव पंथक राजनीति के बिना अधूरा नजर आ रहा है.