पंजाब बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने सोशल मीडिया पर बढ़ते अश्लील, भ्रामक और हिंसक कंटेंट को लेकर सख्ती दिखाई है। आयोग ने राज्य की साइबर सेल को नोटिस जारी करते हुए निर्देश दिए हैं कि वे हंसी-मजाक के नाम पर परोसे जा रहे डबल मीनिंग संवाद, ड्रग्स को बढ़ावा देने वाले वीडियो और गन कल्चर को महिमामंडित करने वाले कंटेंट की पहचान कर उन पर तुरंत प्रतिबंध लगाएं।
आयोग का कहना है कि इस तरह के वीडियो बच्चों और किशोरों की सोच, व्यवहार और मानसिक विकास को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहे हैं। बच्चों में ये कंटेंट हिंसा, नशे और गलत जीवनशैली को आकर्षक बना कर पेश कर रहे हैं, जिससे उनका मानसिक संतुलन और सामाजिक दृष्टिकोण विकृत हो सकता है।
बाल आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि सोशल मीडिया की स्वतंत्रता का यह मतलब नहीं है कि कोई भी कुछ भी पोस्ट करे, खासकर तब जब वह सामग्री सीधे तौर पर कम उम्र के बच्चों को नकारात्मक दिशा में प्रभावित कर रही हो। आयोग ने सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को निर्देशित किया है कि वे अपने कंटेंट मॉडरेशन सिस्टम को और अधिक मजबूत करें और यह सुनिश्चित करें कि बच्चे सुरक्षित डिजिटल वातावरण में ही समय बिताएं।
डिजिटल जिम्मेदारी की जरूरत इंटरनेट आज़ादी के साथ-साथ एक सामाजिक ज़िम्मेदारी भी है। जब सोशल मीडिया पर खुलेआम ऐसे वीडियो शेयर किए जाते हैं, जिनमें नशे, हथियारों और आपत्तिजनक भाषा को सामान्य बना कर दिखाया जाता है, तो वह समाज के सबसे कोमल और संवेदनशील वर्ग यानी बच्चों के लिए बेहद हानिकारक होता है। आयोग ने दोहराया कि मनोरंजन के नाम पर इस तरह की सामग्री को हरगिज़ बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
कड़े कानूनों की मांग बाल मनोचिकित्सकों और शिक्षाविदों ने भी इस चिंता को साझा करते हुए कहा है कि सरकार को चाहिए कि वह सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक कंटेंट को रोकने के लिए ठोस दिशा-निर्देश और सख्त साइबर कानून बनाए। उनके अनुसार, बच्चों की मानसिक और नैतिक सुरक्षा सुनिश्चित करना एक सामूहिक जिम्मेदारी है और इसके लिए हर स्तर पर ठोस कदम उठाने होंगे।