बनारसी पान... ये नाम सुनते ही जुबान पर मिठास घुल जाती है और मन में बनारस की गलियों की तस्वीर उभर आती है. लेकिन ये सिर्फ खाने की चीज नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा और संस्कृति का हिस्सा है. भारत में पान को सिर्फ माउथ फ्रेशनर नहीं, बल्कि आदर और धार्मिकता से जोड़ा गया है. चाहे पूजा-पाठ हो या कोई शुभ काम, पान की पत्ती हर मौके पर जरूरी मानी जाती है और जब बात बनारसी पान की हो, तो बात सिर्फ स्वाद की नहीं, एक एहसास की होती है.
बनारस को शिव की नगरी कहा जाता है और मान्यता है कि भगवान शिव को पान बहुत पसंद है. यहां के लोग मानते हैं कि दिन की शुरुआत अगर पान से हो जाए, तो सारा दिन मंगलमय रहता है. इसलिए बनारसी पान में सिर्फ मिठास नहीं, भोलेनाथ की कृपा भी समाई होती है.
इतिहास गवाह है कि मुगल दौर में पान खास मेहमानों के स्वागत का अहम हिस्सा बन गया था. बनारसी पान की महक और स्वाद ने राजाओं-बादशाहों को भी अपना दीवाना बना लिया था. धीरे-धीरे यह शाही ठाठ-बाठ का प्रतीक बन गया और बनारस इसकी पहचान.
ये जानकर हैरानी हो सकती है कि बनारसी पान की खेती बनारस में नहीं होती. इसकी पत्तियां बंगाल, ओडिशा, तमिलनाडु और यूपी के कई हिस्सों से लाई जाती हैं. लेकिन बनारस में इन्हें एक खास विधि से ‘पकाया’ जाता है, जिससे पत्ते में खास खुशबू और नर्मी आ जाती है. यही प्रक्रिया इसे "बनारसी पान" का दर्जा देती है.
बनारस की गलियों में आपको ऐसी दुकानें मिलेंगी जो पीढ़ियों से सिर्फ पान बेच रही हैं. दीपक तांबूल भंडार, केशव पान भंडार और कृष्णा पान स्टोर जैसे नाम देश-विदेश में मशहूर हैं. नेहरू, अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर अमित शाह और मुलायम सिंह यादव तक यहां पान खाने आ चुके हैं. यहां तक कि रानी विक्टोरिया ने भी इसका स्वाद चखा था!
बनारसी पान सिर्फ चबाने की चीज नहीं, इसे बनाने में भी एक कला छिपी है. सुपारी को कई दिनों तक पानी में भिगोया जाता है, कत्था दूध में भिगोकर बनाया जाता है और गुलकंद, इलायची, लौंग, चिरौंजी और केसर जैसी चीजें उसे एक नया स्वाद देती हैं. हर परत में स्वाद होता है, हर कोने से खुशबू आती है.
बनारस में पान की दर्जनों वैरायटी मिलती हैं – पंचमेवा पान, गुलाब पान, नवरत्न पान, बनारसी केसर पान, अमावट पान, गिलोरी और भी बहुत कुछ. हर पान का स्वाद अलग, पहचान अलग. इसे खाने के बाद जो ताजगी मिलती है, वह सीधे आत्मा तक उतरती है.