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फोन पर डॉक्टर से ली दवाइयां और मरीज की हो गई मौत तो जिम्मेदार कौन? सुनिए हाईकोर्ट का फैसला

क्या हर बार मरीज की मौत के लिए डॉक्टर को दोषी ठहराया जा सकता है? क्या इलाज के दौरान कोई अनहोनी हो जाए तो उसे आपराधिक लापरवाही मान लिया जाना चाहिए? इन्हीं सवालों पर केरल हाईकोर्ट ने सोमवार को एक अहम फैसला सुनाया है, जो चिकित्सा पेशे से जुड़े हर व्यक्ति और आम जनता दोनों के लिए एक बड़ी मिसाल है.

👤 Sagar 21 May 2025 12:44 PM

आज के समय में हर कोई चाहता है कि उसका काम आसान हो जाए. चाहे ऑनलाइन शॉपिंग हो, बैंकिंग हो या इलाज – लोग चाहते हैं कि सबकुछ एक फोन कॉल या मैसेज से हो जाए. लेकिन जब बात स्वास्थ्य की हो, तो यह आदत जानलेवा भी साबित हो सकती है.

हममें से बहुत से लोग तब भी डॉक्टर के पास जाने से बचते हैं, जब खुद या परिवार में किसी की तबीयत खराब होती है. बजाय इसके, हम पड़ोस के किसी डॉक्टर को फोन कर लेते हैं या जान-पहचान वाले डॉक्टर से व्हाट्सऐप पर दवा पूछ लेते हैं. बिना मरीज को दिखाए दवा दी जाती है और मरीज खा भी लेता है. पर सोचिए, अगर ऐसी स्थिति में मरीज की हालत बिगड़ जाए या उसकी मौत हो जाए - तो इसका जिम्मेदार कौन होगा?

क्या हर बार मरीज की मौत के लिए डॉक्टर को दोषी ठहराया जा सकता है? क्या इलाज के दौरान कोई अनहोनी हो जाए तो उसे आपराधिक लापरवाही मान लिया जाना चाहिए? इन्हीं सवालों पर केरल हाईकोर्ट ने सोमवार को एक अहम फैसला सुनाया है, जो चिकित्सा पेशे से जुड़े हर व्यक्ति और आम जनता दोनों के लिए एक बड़ी मिसाल है.

दरअसल, मामला कोच्चि के एक निजी अस्पताल का है, जहां 29 वर्षीय एक किडनी ट्रांसप्लांट मरीज को पेट दर्द और उल्टी की शिकायत के चलते भर्ती किया गया था. मरीज की हालत बिगड़ने पर ड्यूटी पर तैनात नर्स ने वरिष्ठ गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. जोसेफ जॉन को फोन किया. डॉक्टर ने फोन पर ही जरूरी जांच और दवाइयों की सलाह दी। लेकिन दुर्भाग्य से मरीज की 34 घंटे के भीतर मौत हो गई.

इसके बाद मरीज के पिता ने डॉक्टर पर गंभीर लापरवाही का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज कराई. भारतीय दंड संहिता की धारा 304A के तहत केस दर्ज किया गया- जो लापरवाही से हुई मौतों के लिए लगाई जाती है. मामला कोर्ट पहुंचा. जांच और विशेषज्ञों की रिपोर्ट में यह सामने आया कि डॉक्टर ने जो निर्देश दिए थे वे चिकित्सा मानकों के अनुरूप थे.

 केरल हाईकोर्ट के जस्टिस जी. गिरीश ने इस केस की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि 'हर चिकित्सा जटिलता या मौत को आपराधिक लापरवाही नहीं कहा जा सकता, जब तक कि डॉक्टर की ओर से घोर असावधानी या अज्ञानता साबित न हो. कोर्ट ने ये भी कहा कि किसी भी इलाज के नतीजे की गारंटी नहीं होती, और मरीज की जान बचाने की कोशिश करने वाले डॉक्टरों को बिना पुख्ता सबूतों के दोषी ठहराना गलत है.

अंततः, कोर्ट ने माना कि डॉ. जॉन के खिलाफ कोई गंभीर लापरवाही सामने नहीं आई है. उन्होंने जो भी कदम उठाए, वो मेडिकल प्रोटोकॉल के मुताबिक थे. इसलिए उनके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग मानते हुए रद्द कर दिया गया. यह फैसला साफ संदेश देता है- इलाज के हर दुखद परिणाम के लिए डॉक्टर को कसूरवार ठहराना उचित नहीं, जब तक उसकी लापरवाही जानबूझकर और गंभीर रूप से साबित न हो.