Union Budget : हर साल 1 फरवरी को पूरे देश की निगाहें संसद पर टिकी होती हैं, जब केंद्र सरकार अपना यूनियन बजट पेश करती है। यह बजट सिर्फ आंकड़ों और योजनाओं का दस्तावेज नहीं होता, बल्कि ऐसा फैसला होता है जो यह तय करता है कि आम आदमी की कमाई, बचत और खर्च पर आने वाले साल में क्या असर पड़ेगा। इसी वजह से नौकरी पेशा लोग, छोटे कारोबारी और मिडिल क्लास के परिवार बजट को बेहद ध्यान से देखते हैं।
बजट में सबसे ज्यादा चर्चा इनकम टैक्स को लेकर होती है। टैक्स स्लैब में बदलाव, छूट और कटौती सीधे तौर पर लोगों की सैलरी को प्रभावित करते हैं। अगर सरकार टैक्स में राहत देती है या स्टैंडर्ड डिडक्शन बढ़ाती है, तो कर्मचारियों की जेब में ज्यादा पैसा बचता है। वहीं, नया सेस या सरचार्ज लगने से आमदनी पर बोझ बढ़ सकता है।
यूनियन बजट में उद्योगों, MSME और स्टार्टअप्स के लिए किए गए ऐलान रोजगार बाजार को भी प्रभावित करते हैं। जब सरकार किसी सेक्टर को प्रोत्साहन देती है, तो नई नौकरियों के मौके बनते हैं और सैलरी बढ़ने की उम्मीद भी रहती है।
बजट में PPF, NPS, सुकन्या समृद्धि योजना और फिक्स्ड डिपॉजिट जैसी बचत योजनाओं से जुड़े नियमों में बदलाव किए जाते हैं। ब्याज दरों या टैक्स छूट में बदलाव से लोग ज्यादा या कम बचत की योजना बनाते हैं। म्यूचुअल फंड, बीमा और पेंशन योजनाओं को मिलने वाली राहत भी मिडिल क्लास के लंबे समय के फाइनेंशियल प्लान को प्रभावित करती है।
यूनियन बजट का असर रोजमर्रा की जिंदगी पर भी साफ दिखाई देता है। कस्टम ड्यूटी, सब्सिडी और MSP से जुड़े फैसले पेट्रोल, खाने-पीने के सामान और जरूरी वस्तुओं की कीमतों को प्रभावित करते हैं। इसके अलावा, इंफ्रास्ट्रक्चर, आवास और परिवहन पर खर्च बढ़ने से रहने का स्तर और जीवन की सुविधा बदलती है।