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मुस्लिम मर्द एक से ज्यादा रख सकते हैं बीवियां...; इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्यों कि टिप्पणी?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि मुस्लिम पुरुष, मुस्लिम पर्सनल लॉ (मोहम्मडन लॉ) के तहत एक से अधिक विवाह कर सकता है, बशर्ते कि उसकी पहली शादी मान्य और वैध हो. अगर पहली शादी पहले ही अवैध घोषित हो चुकी है, तो दूसरी शादी करने पर द्विविवाह (बिगै

👤 Saurabh 15 May 2025 03:34 PM

इन दिनों हर दिनों इलाहाबाद हाईकोर्ट हैरान कर देने वाले फैसला सुना रहा है जिसको लेकर कहा जा रहा है आखिर इस हाईकोर्ट में क्या चल रहा है.इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि मुस्लिम पुरुष, मुस्लिम पर्सनल लॉ (मोहम्मडन लॉ) के तहत एक से अधिक विवाह कर सकता है, बशर्ते कि उसकी पहली शादी मान्य और वैध हो. अगर पहली शादी पहले ही अवैध घोषित हो चुकी है, तो दूसरी शादी करने पर द्विविवाह (बिगैमी) का अपराध लगेगा.

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की बेंच ने फुरकान नामक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई करते हुए दी, जिस पर उसकी पत्नी ने धोखे से शादी करने, पहली शादी छुपाने और बलात्कार का आरोप लगाया था.

क्या कहा अदालत ने?


अदालत ने कहा- यदि पहली शादी मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत है और मान्य है, तब दूसरी शादी पर सवाल नहीं उठेगा. लेकिन यदि पहली शादी स्पेशल मैरिज एक्ट, फॉरेन मैरिज एक्ट, हिंदू मैरिज एक्ट, क्रिश्चियन मैरिज एक्ट या पारसी मैरिज एंड डिवोर्स एक्ट के तहत हुई थी, और फिर व्यक्ति ने इस्लाम धर्म अपना कर मुस्लिम तरीके से दूसरी शादी की, तो बिगैमी का मामला बन सकता है.

धार्मिक स्वतंत्रता पर कोर्ट की टिप्पणी

कोर्ट ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25 नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता जरूर देता है, लेकिन यह स्वतंत्रता बिना शर्त नहीं है। यह स्वतंत्रता लोक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और संविधान के अन्य मूल अधिकारों के अधीन है. न्यायालय ने कहा कि कुरान में बहुविवाह का ज़िक्र केवल एक बार आया है और वह भी एक ऐतिहासिक परिस्थिति के तहत, जब अरब में युद्धों के कारण कई महिलाएं विधवा और बच्चे अनाथ हो गए थे। उस समय उनकी सुरक्षा और भरण-पोषण के लिए बहुविवाह की इजाजत दी गई थी – और वह भी सख्त शर्तों के साथ.

कोर्ट ने स्पष्ट किया-

“बहुविवाह की अनुमति केवल तभी है जब पुरुष सभी पत्नियों के साथ समानता और न्याय कर सके. इसका गलत उपयोग समाज में स्वार्थवश किया गया है. अंत में अदालत ने समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) को लेकर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि- “धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर कानून का दुरुपयोग न हो, इसके लिए विधायिका को UCC लाने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए.'