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कौन है एवरेस्ट चढ़कर तिरंगा लहराने वाली पहली CISF महिला अफसर?

सीआईएसएफ की गीता सामोता बनीं एवरेस्ट फतह करने वाली पहली महिला अधिकारी, गांव की पहाड़ियों से शुरू हुआ सफर बना अंतरराष्ट्रीय प्रेरणा.

👤 Samachaar Desk 17 Jun 2025 08:39 AM

राजस्थान के एक छोटे से गांव से निकलकर दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा फहराना- ये कहानी है गीता सामोता की. सीआईएसएफ में उप-निरीक्षक के पद पर कार्यरत गीता न केवल पहली महिला बनीं जिन्होंने इस बल से एवरेस्ट फतह किया, बल्कि उन्होंने ये भी साबित किया कि अगर जिद हो तो कोई भी मंजिल दूर नहीं.

गीता का बचपन राजस्थान के सीकर जिले के चक गांव में बीता. चार बहनों के साथ पली-बढ़ीं गीता को बचपन से ही जेंडर इक्वलिटी का सामना करना पड़ा. जब लोग लड़कों की उपलब्धियों के किस्से सुनाते, तो उनके मन में ये सवाल उठता कि लड़कियों की कामयाबी की कहानियां कौन सुनाएगा? तभी उन्होंने ठान लिया था- कुछ बड़ा करना है, पहाड़ों पर चढ़ना है और इतिहास में नाम लिखवाना है.

जब आलोचना बनी प्रेरणा

लोग अक्सर कहते कि 'लड़कियां पहाड़ नहीं चढ़ सकतीं'. लेकिन गीता ने इन बातों को चुनौती की तरह लिया. कॉलेज में वे एक बेहतरीन हॉकी खिलाड़ी थीं, लेकिन एक चोट ने उनके खेल करियर को रोक दिया. यही मोड़ उन्हें पर्वतारोहण की ओर ले गया.

सीआईएसएफ की पहली महिला पर्वतारोही

2011 में गीता सीआईएसएफ से जुड़ीं. 2015 में उन्होंने औली स्थित आईटीबीपी के माउंटेन ट्रेनिंग सेंटर में एडवेंचर कोर्स शुरू किया. वे अपने बैच की इकलौती महिला थीं और 2017 में इसे पूरा कर सीआईएसएफ की पहली महिला पर्वतारोही बनीं.

एवरेस्ट से पहले कई चोटियों पर विजय

गीता ने सिर्फ एवरेस्ट ही नहीं, बल्कि माउंट सतोपंथ, माउंट लोबुचे, माउंट कोजिअस्को (ऑस्ट्रेलिया), माउंट एल्ब्रुस (रूस), माउंट किलिमंजारो (तंजानिया), माउंट एकांकागुआ (अर्जेंटीना) जैसी चोटियों पर भी फतह हासिल की. उन्होंने ‘सेवन समिट चैलेंज’ की शुरुआत की और मात्र छह महीने में चार महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों पर चढ़ाई कर डाली.

तीन दिन में पांच चोटियां

भारत लौटने के बाद गीता ने लद्दाख के रूपशु क्षेत्र की पांच चोटियों- तीन 6000 मीटर और दो 5000 मीटर से ऊपर पर मात्र तीन दिनों में चढ़ाई कर एक और कीर्तिमान स्थापित किया.

एवरेस्ट पर तिरंगा फहराने का भावुक पल

गीता बताती हैं कि एवरेस्ट चढ़ाई के दौरान हिमस्खलन, सन्न कर देने वाली थकावट और रास्ते में मिले शवों ने मानसिक रूप से तोड़ने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. 19 मई की सुबह जब उन्होंने चोटी पर कदम रखा और तिरंगा लहराया, तो वह क्षण हर दर्द, संघर्ष और आंसू का जवाब बन गया.