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अकाली दल में ‘पावर गेम’ शुरू? मजीठिया की जमानत के बाद बदले सियासी समीकरण, क्या बढ़ेगी अंदरूनी टकराव की आंच!

Bikram Singh Majithia bail: बिक्रम सिंह मजीठिया को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने के बाद शिरोमणि अकाली दल की राजनीति में नई हलचल देखी जा रही है. पार्टी के भीतर नेतृत्व और रणनीति को लेकर चर्चाएं तेज हैं.

👤 Ashwani Kumar 12 Feb 2026 11:13 AM

पंजाब की राजनीति में शिरोमणि अकाली दल एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है. वरिष्ठ नेता बिक्रम सिंह मजीठिया की जमानत के बाद पार्टी के भीतर गतिविधियां तेज हो गई हैं. राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि क्या संगठन के अंदर दो प्रभावशाली धड़े आकार ले रहे हैं. हालांकि पार्टी इसे मजबूती का संकेत बता रही है, लेकिन अंदरूनी समीकरणों को लेकर सवाल उठने लगे हैं.

मजीठिया की रिहाई से बढ़ी सक्रियता

ड्रग मनी और आय से अधिक संपत्ति के आरोपों में जून 2025 में गिरफ्तार हुए बिक्रम सिंह मजीठिया को हाल ही में सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली है. नाभा जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने तुरंत अपने समर्थकों से मुलाकातें शुरू कर दीं. अमृतसर समेत कई स्थानों पर वे कार्यकर्ताओं के बीच दिखाई दिए और पुराने कैडर को दोबारा सक्रिय करने की कोशिश में जुट गए.

उनकी रिहाई पर समर्थकों ने उत्साह दिखाया, जिससे साफ है कि जमीनी स्तर पर उनका प्रभाव अब भी कायम है.

सुखबीर बादल की समानांतर कवायद

दूसरी ओर, शिअद अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल भी संगठन को मजबूत करने के प्रयासों में लगे हैं. वे लंबे समय से नाराज चल रहे नेताओं और कार्यकर्ताओं को पार्टी में वापस लाने की मुहिम चला रहे हैं. हालांकि मजीठिया की रिहाई के बाद दोनों नेता किसी बड़े सार्वजनिक मंच पर साथ नजर नहीं आए हैं, जिससे अटकलों को बल मिला है.

पार्टी का कहना है कि दोनों नेता संगठन को मजबूत करने के लिए अलग-अलग मोर्चों पर काम कर रहे हैं.

चुनाव से पहले बढ़ी रणनीतिक चिंता

कुछ वरिष्ठ नेताओं को आशंका है कि विरोधी दल आगामी चुनावों में मजीठिया पर लगे आरोपों को मुद्दा बना सकते हैं. पंजाब में नशे का विषय हमेशा से संवेदनशील रहा है और चुनावी राजनीति में यह बड़ा हथियार साबित होता रहा है. ऐसे में मजीठिया की सक्रियता को लेकर रणनीतिक स्तर पर सावधानी बरती जा रही है.

हालांकि पार्टी पदाधिकारियों का दावा है कि उनकी वापसी से संगठन को नई ऊर्जा मिली है और 2027 के विधानसभा चुनाव में सत्ता वापसी ही लक्ष्य है.

पहले भी सामने आ चुके हैं मतभेद

मार्च 2025 में एसजीपीसी से जुड़े तख्त जत्थेदारों की बर्खास्तगी के मुद्दे पर सुखबीर बादल और मजीठिया के बीच मतभेद खुलकर सामने आए थे. उस दौरान मजीठिया ने फैसले का विरोध किया था, जबकि पार्टी नेतृत्व ने इसे अनुशासन का मुद्दा बताया. इस घटनाक्रम ने दोनों नेताओं के रिश्तों पर सवाल खड़े किए थे.

फिलहाल शिअद के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखना है. यदि पार्टी अंदरूनी मतभेदों को संतुलित कर लेती है, तो यह उसकी मजबूती बन सकता है. लेकिन यदि ये समीकरण गहराते हैं, तो आगामी चुनावों में इसका असर देखने को मिल सकता है.