दिल्ली सरकार 4 से 11 जुलाई के बीच पहली बार कृत्रिम बारिश (आर्टिफिशियल रेन) का ट्रायल करने जा रही है। इसका मकसद दिल्ली की खराब हवा और प्रदूषण को कम करना है।
इस योजना में आईआईटी कानपुर तकनीकी मदद करेगा और डीजीसीए (नागरिक विमानन विभाग) से इजाजत भी ली जा चुकी है। यह ट्रायल तभी किया जाएगा जब मौसम का हाल सही रहेगा। इसके लिए सरकार लगभग 3.21 करोड़ रुपये खर्च करेगी।
हर ट्रायल में 90 मिनट तक विमान उड़ाया जाएगा।
विमान से बादलों में नैनो कणों और नमक जैसी चीजों का छिड़काव होगा।
इससे बादल में बदलाव आकर बारिश हो सकती है।
यह ट्रायल उत्तर-पश्चिम और बाहरी दिल्ली के सुरक्षित हवाई इलाकों में किया जाएगा।
एक उड़ान लगभग 100 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को कवर करेगी।
दिल्ली में कई बार कृत्रिम बारिश की योजना बनी लेकिन अनुमति, तकनीकी और मौसम की वजहों से पहले यह संभव नहीं हो पाया था। इस बार सरकार ने पूरी तैयारी की है।
मौसम विभाग का कहना है कि दिल्ली में मानसून 28 जून को आ गया है, लेकिन अभी तक ज्यादा बारिश नहीं हुई। उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान में भी यही हाल है। अगले 3-4 दिन में मौसम में सुधार की उम्मीद है।
कृत्रिम बारिश यानी क्लाउड सीडिंग में वैज्ञानिक बादलों में कुछ रसायन (जैसे सिल्वर आयोडाइड, पोटेशियम आयोडाइड, सूखी बर्फ, नमक आदि) डालते हैं। ये रसायन बादलों को ठंडा कर बर्फ के कण बनाते हैं, जो बाद में पानी बनकर बरसते हैं।
रसायन को विमान से, जमीन पर लगे जेनरेटर, एंटी-एयरक्राफ्ट गन या रॉकेट के ज़रिए बादलों में छोड़ा जाता है। इसके लिए जरूरी है कि कम से कम 40% बादल आसमान में हों। इस पूरी प्रक्रिया को ही क्लाउड सीडिंग या कृत्रिम वर्षा कहा जाता है।