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Delhi Riots: 5 साल जेल में रहने के बाद भी जमानत नहीं! उमर खालिद-शरजील इमाम पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख

Delhi Riots Case: सुप्रीम कोर्ट ने 2020 दिल्ली दंगों के मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया है. कोर्ट ने उनकी भूमिका को गंभीर मानते हुए यूएपीए की सख्त शर्तें लागू कीं.

👤 Samachaar Desk 05 Jan 2026 02:37 PM

साल 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े एक अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है. दंगों के आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से अदालत ने इनकार कर दिया है. दोनों ने यह दलील दी थी कि वे पिछले पांच साल से ज्यादा समय से जेल में बंद हैं और अभी तक मुकदमा पूरा नहीं हुआ है, इसलिए उन्हें जमानत मिलनी चाहिए. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उनके साथ याचिका दाखिल करने वाले पांच अन्य आरोपियों को जमानत दे दी है.

किन 5 आरोपियों को मिली जमानत?

सुप्रीम कोर्ट से जिन पांच आरोपियों को राहत मिली है, उनके नाम हैं: गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम और शादाब अहमद.

इन सभी ने भी यह दलील दी थी कि वे लंबे समय से जेल में हैं और अब तक ट्रायल पूरा नहीं हुआ है. जस्टिस अरविंद कुमार और एन. वी. अंजारिया की बेंच ने माना कि इन पांचों की भूमिका उमर खालिद और शरजील इमाम की तुलना में कम गंभीर है. इसी आधार पर अदालत ने उन्हें जमानत देने का फैसला किया.

उमर और शरजील को जमानत क्यों नहीं मिली?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम की भूमिका इस मामले में केंद्रीय (मुख्य) मानी गई है. अदालत के अनुसार, इन दोनों पर लगे आरोपों की गंभीरता ज्यादा है और उनके खिलाफ जो सबूत पेश किए गए हैं, उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. यही वजह रही कि कोर्ट ने इन्हें फिलहाल जमानत देने से मना कर दिया.

यूएपीए कानून बना बड़ी वजह

इस केस में सभी आरोपियों पर आईपीसी, आर्म्स एक्ट के साथ-साथ यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम) की धाराएं भी लगाई गई हैं. यूएपीए की धारा 43D(5) के तहत जमानत पाना बेहद मुश्किल होता है. इस कानून के अनुसार, आरोपी को यह साबित करना होता है कि उसके खिलाफ लगे आरोप पहली नजर में ही गलत हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम इस शर्त को पूरा नहीं कर पाए, इसलिए उनके मामले में यूएपीए की सख्त शर्तें लागू रहेंगी.

अनुच्छेद 21 का हवाला भी नहीं आया काम

सभी आरोपियों ने संविधान के अनुच्छेद 21 यानी जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हवाला देकर जमानत मांगी थी. कोर्ट ने पांच आरोपियों को तो लंबी हिरासत के आधार पर राहत दे दी, लेकिन उमर और शरजील के मामले में कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा और गंभीर आरोपों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

सुप्रीम कोर्ट का निर्देश: ट्रायल में तेजी लाएं

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दिल्ली पुलिस और निचली अदालत को मुकदमे में तेजी लाने के निर्देश दिए हैं. कोर्ट ने यह भी कहा है कि जैसे ही मुख्य गवाहों की गवाही पूरी हो जाती है, उसके बाद उमर खालिद और शरजील इमाम फिर से जमानत के लिए आवेदन कर सकते हैं.

अगर ट्रायल में ज्यादा देरी होती है, तो कोर्ट ने यह भी छूट दी है कि एक साल बाद दोनों फिर से निचली अदालत में जमानत की मांग कर सकते हैं.

क्या है 2020 दिल्ली दंगों का पूरा मामला?

फरवरी 2020 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध के दौरान दिल्ली में हिंसक दंगे भड़क उठे थे. इन दंगों में 53 लोगों की मौत हुई थी और सैकड़ों लोग घायल हुए थे. दिल्ली पुलिस का आरोप है कि इन दंगों के पीछे सुनियोजित साजिश थी. पुलिस के अनुसार, आरोपियों ने हिंसा फैलाने, अवैध जमावड़ा करने और देश की अखंडता को नुकसान पहुंचाने की योजना बनाई थी.

इसी आधार पर उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य आरोपियों के खिलाफ दंगा, आपराधिक साजिश, यूएपीए समेत कई गंभीर धाराओं में केस दर्ज किए गए.

आगे क्या?

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला साफ करता है कि अदालत लंबी हिरासत और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को जरूर महत्व देती है, लेकिन जब मामला राष्ट्रीय सुरक्षा और गंभीर आरोपों से जुड़ा हो, तो कानून की सख्ती भी उतनी ही अहम हो जाती है. अब सभी की नजर इस बात पर है कि निचली अदालत में ट्रायल कितनी तेजी से आगे बढ़ता है और आने वाले समय में उमर खालिद और शरजील इमाम को कोई राहत मिलती है या नहीं.