उत्तर प्रदेश के इटावा में कथावाचक के साथ हुई बदसलूकी के मामले ने अब तूल पकड़ लिया है. यह विवाद अब धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक बहस का मुद्दा बनता जा रहा है. इस मामले में अब जाने-माने कवि और वक्ता कुमार विश्वास ने खुलकर अपनी राय रखी है. उन्होंने कथावाचक के समर्थन में एक ठोस और विचारणीय बयान दिया, जिससे सोशल मीडिया से लेकर धार्मिक मंचों तक बहस तेज हो गई है.
एनडीटीवी को दिए एक इंटरव्यू में, कुमार विश्वास ने कहा कि “कृष्ण की कथा सुना रहे यदुवंशी कथावाचक पर सवाल उठाना दुर्भाग्यपूर्ण है.” उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, “महाभारत और रामायण जैसी धार्मिक महाकाव्य जिन पर आज करोड़ों लोगों की आस्था टिकी है, उन्हें रचने वाले न तो ब्राह्मण थे, न ही क्षत्रिय. महर्षि वाल्मीकि और वेदव्यास, दोनों ही निचली जातियों से आए थे, लेकिन आज पूरा धर्म उन्हीं के लिखे ग्रंथों से चलता है.”
उन्होंने आगे कहा कि धर्म की व्याख्या करने वालों को धर्म की आत्मा समझनी चाहिए, न कि केवल जातिगत पहचान पर टिप्पणी करनी चाहिए. उन्होंने पुलिस जांच की बातों को उचित ठहराते हुए कहा कि “अगर कथावाचक के दस्तावेजों में कुछ गलत है, तो उसकी जांच हो, लेकिन किसी को कथा करने से रोकना धार्मिक स्वतंत्रता और परंपरा का अपमान है.”
कुमार विश्वास ने अपनी बात को बेहद स्पष्ट शब्दों में रखते हुए कहा कि “मैं भी एक ऐसे कुल से आता हूं जहां मुझसे कुछ कहा जा सकता है, लेकिन जब मैं व्यासपीठ पर बैठता हूं, तो सिर्फ राम-राम कहता हूं.” उनका यह कथन बताता है कि मंच और धर्म किसी जाति का मोहताज नहीं होता, बल्कि श्रद्धा, ज्ञान और भावना का प्रतीक होता है.
इस बीच योगी सरकार में मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने भी एक विवादास्पद बयान देते हुए कहा कि “शादी और पूजा-पाठ कराना ब्राह्मणों का काम है, यादव यदि ये करने लगेंगे तो विवाद तो होगा ही.” उनके इस बयान की कड़ी आलोचना हो रही है.
इस पूरे घटनाक्रम ने धर्म और जाति के नाम पर फैल रहे भेदभाव की परतें उधेड़ दी हैं. कुमार विश्वास का बयान इस बात की ओर इशारा करता है कि धर्म की सेवा जाति से नहीं, समर्पण और श्रद्धा से की जाती है.
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